It is difficult to know what is right in all cases. - M.B., I.210.29

Dekha Hai Aise Bhi


घर को मैं निकला, तन्हा, अकेला,
साथ मेरे कौन है? यार है मेरा!
जो भी करना था, कर आ गया मैं,
प्यार को ही मानते चलते जाना...

देखा है ऐसे भी, किसी को ऐसे ही,

अपने भी दिल में बसाये हुए कुछ इरादे हैं,
दिल के किसी कोने में भी कुछ ऐसे ही वादे हैं,
इनको लिए जब हम चले, नज़ारे भी हम से मिले...

देखा है ऐसे भी, किसी को ऐसे ही,

हँसते-हँसाते, यूं सबको मनाते हम जाएँगे,
बरसों की दूरी को मिल के हम साथ मिटाएँगे,
प्यार रहे उनके लिए जो ढूंढे! वो उनको मिले...

थोड़ा सा गरज़ है, थोड़ी सी समझ है,
चाहतों के दायरे में रुकना फ़रज़ (फ़र्ज़ ) है,
कोई कहता है के घर आ गया है,
आरज़ू भी अर्ज़ है, बढ़ते जाना...

देखा है ऐसे भी, किसी को ऐसे ही,

दिल के झरोखो में अब भी मोहब्बत के सायें हैं,
रह जाए जो बाद में भी हमारे, वो पाये हैं,
इनके लिए अब तक चलें हजारों में हम भी मिले...





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