It is difficult to know what is right in all cases. - M.B., I.210.29

Nahi Rakhta Dil Mein Kuch


नहीं रखता दिल में कुछ,
रखता हूँ ज़ुबां पर,
समझे ना अपने भी कभी,

कह नहीं सकता
मैं क्या सहता हूँ छुपा कर,
एक ऐसी आदत है मेरी,

सभी तो है जिनसे मिलता हूँ,
सही जो है इनसे कहता हूँ;
जो समझता हूँ,

मैंने देखा नहीं रंग-ए-दिल 
आया है जिद-अदा पर,
एक ऐसी चाहत है मेरी,
बहारों के घेरे से
लाया मैं दिल सजाकर,
एक ऐसी सोहबत है मेरी,

साये में छाए रहता हूँ,
आँखें बिछाए रहता हूँ;
जिनसे मिलता हूँ,

कितनो को देखा है हमने यहाँ,
कुछ सीखा है हमने उनसे नया...

हो ओ ओ, हो ओ, हो ओ ओ, हो ओ...

पेहले फ़ुरसत थी, अब हसरत है समाकल (Adj. Integral),
एक ऐसी उलझन है मेरी, 
(Notice the ingenious use of word 'uljhan' as a mathematical reference to 'integral')
खुद चल के रुकता हूँ जहाँ जिस जगह, पल
(जिस जगह और/या  जिस पल),

एक ऐसी सरहद है मेरी,

कहने से भी मैं डरता हूँ,
अपनो के धुन में रहता हूँ,
कर क्या सकता हूँ?!
दे सकता हूँ मैं 
थोड़ा प्यार यहाँ पर,
जितनी हेसियत है मेरी,
रह जाऊँ सब के दिल में
दिल को बसाकर,
एक ऐसी नीयत है मेरी,

हो जायें तो भी राज़ी हूँ,
हो जाऊँ तो मैं बाकी हूँ,
यूँ समझता हूँ...

रस्ते ना बदले, ना बदला जहां,
फिर क्यूँ बदलते क़दम हैं यहाँ?






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